बाबा रामदेव जी महाराज राजस्थान के एक प्रसिद्ध लोकदेवता हैं, जिन्हें रामसा पीर, रामदेव पीर और रुणिचा रा धणी जैसे नामों से भी जाना जाता है। वे 14वीं-15वीं शताब्दी के मध्यकालीन भारत में एक समाज सुधारक, चमत्कारी संत और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में विख्यात हुए। Baba Ramdev ji Maharaj का जीवन सामाजिक समानता, भक्ति और चमत्कारों की कहानियों से भरा हुआ है, जो आज भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में लोक कथाओं और भजनों के माध्यम से जीवित है। इस लेख में हम बाबा रामदेव जी महाराज के जीवन परिचय को विस्तार से जानेंगे, जिसमें उनके जन्म, परिवार, समाज सुधार, चमत्कार और समाधि जैसे पहलुओं पर प्रकाश डाला जाएगा।
बाबा रामदेव जी महाराज का जन्म और प्रारंभिक जीवन
बाबा रामदेव जी का जन्म विक्रम संवत 1409 (लगभग 1352 ईस्वी) में भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ था। Baba Ramdev ji Maharaj के जन्म स्थान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन अधिकांश मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के ऊँडूकासमेर गाँव में हुआ था। वे तंवर (तोमर) राजपूत वंश से संबंधित थे, जो उस समय पश्चिमी राजस्थान में शासक वर्ग का हिस्सा था। Baba Ramdev ji Maharaj के पिता का नाम अजमल जी तंवर और माता का नाम मैणादे था। कथाओं में यह भी कहा जाता है कि अजमल जी पोकरण क्षेत्र के शासक थे और संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की थी। इस प्रार्थना के फलस्वरूप उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए—बड़े पुत्र वीरमदेव और छोटे पुत्र रामदेव।
लोक कथाओं के अनुसार, बाबा रामदेव जी के जन्म के समय कई चमत्कारी घटनाएँ हुई थीं। माना जाता है कि उनके जन्म के साथ ही मंदिरों में घंटियाँ स्वतः बजने लगीं, महल का पानी दूध में बदल गया और आकाश में तेज प्रकाश फैल गया। ये संकेत उनके अलौकिक व्यक्तित्व की ओर इशारा करते थे। लोग उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का अवतार भी मानते हैं, क्योंकि उनकी भक्ति और चमत्कार श्रीकृष्ण की लीलाओं से मिलते-जुलते थे।
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बाबा रामदेव जी महाराज का बचपन और शिक्षा
बाबा रामदेव जी का बचपन सामान्य बच्चों से अलग था। कहा जाता है कि वे बचपन से ही अलौकिक शक्तियों से संपन्न थे। उनकी रुचि खेलकूद से अधिक आध्यात्मिकता और समाज सेवा में थी। एक लोक कथा के अनुसार, जब वे अपने साथियों के साथ गेंद खेल रहे थे, तो Baba Ramdev ji Maharaj ने गेंद को इतनी दूर फेंक दिया कि कोई उसे लाने को तैयार नहीं हुआ। इस घटना के बाद वे सातलमेर पहाड़ी पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने तांत्रिक भैरव राक्षस का वध किया। इस घटना ने उनके जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया कि वे समाज को दुष्ट शक्तियों से मुक्त करवाने के लिए अवतरित हुए हैं।
Baba Ramdev ji Maharaj के गुरु का नाम बालीनाथ जी था, जो एक सिद्ध योगी थे। बालीनाथ जी से उन्होंने योग, ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। बालीनाथ जी ने उन्हें समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और भक्ति का मार्ग दिखाने की प्रेरणा दी। इस शिक्षा ने Baba Ramdev ji Maharaj के जीवन को एक नई दिशा दी और वे लोक कल्याण के लिए समर्पित हो गए।
बाबा रामदेव जी महाराज का विवाह और पारिवारिक जीवन
बाबा रामदेव जी का विवाह अमरकोट (वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित) के सोढ़ा राजपूत शासक दलै सिंह की पुत्री निहालदे (नेतलदे) के साथ हुआ था। यह विवाह उस समय के राजपूत परंपराओं के अनुसार संपन्न हुआ। हालाँकि, विवाह के बाद भी उनका ध्यान सांसारिक सुखों से अधिक समाज कल्याण और भक्ति पर रहा। Baba Ramdev ji Maharaj की पत्नी निहालदे ने भी उनके कार्यों में सहयोग किया और उनके विचारों का सम्मान किया। कुछ कथाओं में यह भी कहा जाता है कि उनका पारिवारिक जीवन सीमित था, क्योंकि वे अपना अधिकांश समय जनसेवा में बिताते थे।
बाबा रामदेव जी महाराज समाज सुधार और हिंदू-मुस्लिम एकता
बाबा रामदेव जी का सबसे बड़ा योगदान समाज में व्याप्त छुआछूत, ऊँच-नीच और भेदभाव को खत्म करना था। उस समय मध्यकालीन भारत में जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता चरम पर थी। रामदेव जी ने सभी मनुष्यों को समान माना, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ग से हों। Baba Ramdev ji Maharaj ने दलितों और गरीबों की सहायता की और उन्हें समाज में सम्मान दिलाने का प्रयास किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध भक्त डाली बाई एक दलित कन्या थी, जिसे उन्होंने अपनी बहन या बेटी की तरह पाला और समाज को यह संदेश दिया कि कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता।
Baba Ramdev ji Maharaj ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच एकता स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदू उन्हें रामदेव जी के रूप में पूजते थे, तो मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहकर सम्मान देते थे। राजस्थान में पाँच प्रसिद्ध पीरों (संतों) में उनका नाम शामिल है। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, मक्का से आए पाँच पीरों ने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे अपने खाने के बर्तन मक्का में भूल आए हैं और उसी में भोजन करेंगे। रामदेव जी ने चमत्कारिक रूप से उन बर्तनों को मक्का से रुणिचा ला दिया, जिसके बाद पीरों ने उन्हें “पीरों का पीर” कहकर सम्मानित किया। यह घटना उनकी अलौकिक शक्ति और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
बाबा रामदेव जी महाराज के चमत्कार और परचे
बाबा रामदेव जी के जीवन में 24 प्रमुख चमत्कारों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें “परचे” कहा जाता है। ये चमत्कार उनकी दिव्य शक्ति और भक्तों के प्रति करुणा को दर्शाते हैं। कुछ प्रमुख परचों का विवरण निम्नलिखित है:
1. **भैरव राक्षस का वध**: पोकरण क्षेत्र में भैरव नामक राक्षस का आतंक था, जो लोगों को परेशान करता था। रामदेव जी ने अपनी शक्ति से उसका अंत किया और क्षेत्र को शांति प्रदान की।
2. **पाँच पीरों का मिलन**: मक्का से आए पीरों को चमत्कार दिखाकर उन्होंने सभी धर्मों की एकता का संदेश दिया।
3. **खाती को पुनर्जनम**: एक मृत खाती (कारीगर) को जीवित कर उन्होंने अपनी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन किया।
4. **मिश्री को नमक में बदलना**: एक बार उन्होंने मिश्री को नमक में बदलकर अपनी शक्ति दिखाई।
5. **दर्जी का उद्धार**: एक दर्जी ने उनके लिए कपड़े का घोड़ा बनाया। रामदेव जी ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे कष्टों से मुक्ति दी और उस घोड़े को “लीला घोड़ा” नाम दिया, जो आज भी उनके मंदिरों में पूजा जाता है।
इन चमत्कारों के कारण उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और लोग Baba Ramdev ji Maharaj को लोकदेवता के रूप में पूजने लगे।
बाबा रामदेव जी महाराज का रामदेवरा और समाधि
बाबा रामदेव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में पोकरण से 12 किलोमीटर दूर रुणिचा नामक गाँव की स्थापना की, जिसे आज रामदेवरा के नाम से जाना जाता है। Baba Ramdev ji Maharaj ने वहाँ रामसरोवर तालाब और परचा बावड़ी का निर्माण करवाया, ताकि क्षेत्र के लोगों को जल की समस्या न हो। विक्रम संवत 1458 (लगभग 1401 ईस्वी) में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को उन्होंने रामसरोवर की पाल पर जीवित समाधि ली। इससे एक दिन पहले उनकी भक्त डाली बाई ने समाधि ली थी। Baba Ramdev ji Maharaj की समाधि के बाद वह स्थान एक प्रमुख तीर्थ बन गया।
रामदेवरा में Baba Ramdev ji Maharaj के मंदिर मे हर साल भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से दशमी तक एक विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु (जातरु) देश भर से पैदल या अपने वाहनों से आते हैं।
बाबा रामदेव जी महाराज का लोकदेवता के रूप में मान्यता
बाबा रामदेव जी को राजस्थान के पाँच प्रमुख लोकदेवताओं में गिना जाता है। उनके अनुयायी उन्हें नीले घोड़े पर सवार दर्शाते हैं, जो उनकी शक्ति और तेज का प्रतीक है। Baba Ramdev ji Maharaj के भक्तों में मेघवाल समाज के लोग प्रमुख हैं, जिन्हें “रिखिया” कहा जाता है। उनके भजनों को “ब्यावले” कहते हैं, जो उनकी गाथाओं का यशोगान करते हैं। उनकी ध्वजा को “नेजा” कहा जाता है और रात्रि जागरण को “जम्मा” कहते हैं।
बाबा रामदेव जी महाराज का जीवन एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो सामाजिक समानता, धार्मिक एकता और लोक कल्याण के लिए समर्पित था। Baba Ramdev ji Maharaj के चमत्कार और समाज सुधार आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। रामदेवरा का मंदिर उनकी आस्था का केंद्र है, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय श्रद्धा से सिर झुकाते हैं। उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इस प्रकार, बाबा रामदेव जी न केवल एक लोकदेवता हैं, बल्कि एक ऐसे संत हैं, जिनका जीवन हमें एकता और सेवा का पाठ पढ़ाता है।