राणा सांगा, जिनका पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह सिसोदिया था, मेवाड़ के एक महान शासक और वीर योद्धा थे। वे सिसोदिया राजवंश के प्रमुख प्रतिनिधि थे और 16वीं शताब्दी के प्रारंभिक भारत के सबसे प्रभावशाली राजपूत राजाओं में से एक माने जाते हैं। Maharana sanga शासनकाल 1508 से 1528 तक रहा, और इस दौरान उन्होंने अपने अदम्य साहस, नेतृत्व कौशल और युद्ध कौशल से मेवाड़ की शक्ति और प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। राणा सांगा का जीवन संघर्ष, वीरता और बलिदान की एक अनुपम गाथा है, जो भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। यहाँ उनका विस्तृत जीवन परिचय प्रस्तुत है।
महाराणा सांगा का जन्म और प्रारंभिक जीवन
राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को मालवा के चित्तौड़गढ़ में हुआ था। वे मेवाड़ के राणा रायमल के पुत्र थे। उनकी माता का नाम रानी कर्णावती था। राणा सांगा का जन्म उस समय हुआ जब मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश अपने शक्ति के चरम पर था, लेकिन साथ ही उसे चारों ओर से शत्रुओं का खतरा भी मंडरा रहा था। उनके जन्म के समय मेवाड़ एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था, जो अपनी सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक वैभव के लिए प्रसिद्ध था।
राणा सांगा का बचपन युद्ध कौशल और शस्त्र विद्या सीखने में बीता। उन्होंने छोटी उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, भाला फेंकना और धनुर्विद्या में महारत हासिल कर ली थी। उनके पिता राणा रायमल ने उन्हें कठोर परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस के साथ जीने की शिक्षा दी। राणा सांगा के जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना तब हुई जब उनके बड़े भाई पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद राणा सांगा को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया गया।
महाराणा सांगा गद्दी पर आरूढ़ होना
राणा रायमल की मृत्यु के बाद 1508 में राणा सांगा मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय मेवाड़ की स्थिति चुनौतीपूर्ण थी। पड़ोसी राज्यों जैसे मालवा, गुजरात और दिल्ली सल्तनत के शासकों से लगातार खतरा बना रहता था। राणा सांगा ने अपने शासनकाल की शुरुआत में ही यह संकल्प लिया कि वे मेवाड़ की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करेंगे। उनके शासनकाल में मेवाड़ ने न केवल अपनी सीमाओं का विस्तार किया, बल्कि राजपूत एकता को भी मजबूत करने का प्रयास किया।
महाराणा सांगा व्यक्तित्व और शारीरिक विशेषताएं
राणा सांगा एक विशालकाय और शक्तिशाली व्यक्तित्व के धनी थे। इतिहासकारों के अनुसार, उनकी लंबाई लगभग 7 फीट थी, और उनका शरीर अत्यंत बलिष्ठ था। वे एक कुशल योद्धा थे और युद्ध के मैदान में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके शरीर पर 80 से अधिक घावों के निशान थे, जो उनकी बहादुरी और युद्धों में उनकी सक्रिय भागीदारी का प्रमाण थे। एक युद्ध में उनका एक हाथ कट गया था, और एक आंख की रोशनी भी चली गई थी। इसके बावजूद, उनकी लड़ने की क्षमता और नेतृत्व में कोई कमी नहीं आई।
महाराणा सांगा प्रमुख युद्ध और विजय
राणा सांगा का शासनकाल युद्धों और विजयों से भरा हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े और अपने शत्रुओं को परास्त किया। उनके कुछ प्रमुख युद्ध इस प्रकार हैं:
1. राणा सांगा का मालवा के खिलाफ युद्ध
मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने मेवाड़ पर आक्रमण करने का प्रयास किया था। राणा सांगा ने मालवा की सेना को करारी शिकस्त दी और महमूद खिलजी को बंदी बना लिया। इस विजय ने मेवाड़ की शक्ति को और मजबूत किया।
2. राणा सांगा का गुजरात के सुल्तान के खिलाफ युद्ध
गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह द्वितीय ने भी मेवाड़ पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन राणा सांगा ने उनकी सेना को परास्त कर दिया। इस युद्ध में राणा सांगा ने अपनी रणनीति और साहस का परिचय दिया।
3. राणा सांगा का दिल्ली सल्तनत के खिलाफ संघर्ष
राणा सांगा का सबसे बड़ा सपना था कि वे राजपूतों को एकजुट करके दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी को परास्त करें और हिंदुस्तान में राजपूत शासन की स्थापना करें। उन्होंने कई राजपूत राजाओं को अपने साथ मिलाया और एक विशाल सेना तैयार की।
4. राणा सांगा का खानवा का युद्ध (1527)
खानवा का युद्ध राणा सांगा के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक युद्ध था। यह युद्ध 17 मार्च 1527 को मुगल बादशाह बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ। बाबर ने पानीपत के युद्ध (1526) में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया था और अब वह अपनी शक्ति को और मजबूत करना चाहता था। राणा सांगा ने बाबर को भारत से बाहर निकालने के लिए एक विशाल सेना के साथ उसका मुकाबला किया। इस सेना में मेवाड़ के साथ-साथ अन्य राजपूत राजाओं और उनके सहयोगियों की टुकड़ियाँ शामिल थीं।
युद्ध की शुरुआत में राणा सांगा की सेना ने बाबर की सेना पर भारी पड़त थी। लेकिन बाबर ने अपनी तोपों और बारूद के इस्तेमाल से युद्ध का रुख बदल दिया। राणा सांगा गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी सेना को हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में राणा सांगा की हार ने मेवाड़ और राजपूत शक्ति को बड़ा झटका दिया।
महाराणा सांगा की रणनीति और नेतृत्व
राणा सांगा एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी नेता थे। वे युद्ध के मैदान में अपनी सेना का नेतृत्व स्वयं करते थे और सैनिकों के बीच उनकी उपस्थिति प्रेरणा का स्रोत होती थी। उन्होंने अपने शत्रुओं की कमजोरियों को पहचानने और उसका लाभ उठाने में महारत हासिल की थी। वे अपने सैनिकों और प्रजा के प्रति उदार और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी सेना में विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग शामिल थे, जो उनकी लोकप्रियता और समावेशी नीति को दर्शाता है।
महाराणा सांगा का परिवार और उत्तराधिकारी
राणा सांगा की कई रानियाँ थीं, जिनमें रानी कर्णावती सबसे प्रसिद्ध थीं। उनके कई पुत्र थे, जिनमें रतन सिंह, विक्रमादित्य और उदय सिंह प्रमुख थे। राणा सांगा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रतन सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली, लेकिन उनका शासनकाल छोटा रहा। बाद में उदय सिंह मेवाड़ के शासक बने, जिनके पुत्र महाराणा प्रताप ने अपने पिता और दादा की वीरता की परंपरा को आगे बढ़ाया।
महाराणा सांगा की मृत्यु
खानवा के युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद राणा सांगा को उनके सहयोगी उनके शिविर में ले गए। वहाँ उनकी हालत बिगड़ती गई। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उनके अपने ही कुछ विश्वासघाती सरदारों ने उन्हें जहर दे दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि राणा सांगा फिर से शक्ति प्राप्त करें। 30 जनवरी 1528 को बसवा (वर्तमान राजस्थान) में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने मेवाड़ और राजपूत इतिहास में एक युग का अंत कर दिया।
राणा सांगा का योगदान और विरासत
राणा सांगा का योगदान केवल युद्धों तक सीमित नहीं था। उन्होंने मेवाड़ में कला, संस्कृति और स्थापत्य कला को भी प्रोत्साहित किया। उनके शासनकाल में चित्तौड़गढ़ का किला और अन्य संरचनाएँ मजबूत की गईं। वे एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे और अपने राज्य में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देते थे।
उनकी सबसे बड़ी विरासत उनकी वीरता और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण थी। उन्होंने कभी भी विदेशी शासकों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया और अंतिम सांस तक मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहे। उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है और भारतीय इतिहास में उनका नाम अमर है।
राणा सांगा के जीवन का निष्कर्ष
राणा सांगा एक ऐसे योद्धा और शासक थे जिन्होंने अपने जीवन में असंख्य चुनौतियों का सामना किया, फिर भी वे कभी हिम्मत नहीं हारे। उनकी वीरता, नेतृत्व और देशभक्ति की भावना उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान नायकों में से एक बनाती है। खानवा की हार के बावजूद, उनकी लड़ाई और बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल कायम की। राणा सांगा का जीवन एक ऐसी गाथा है जो समय के साथ और भी प्रेरणादायक बनती जा रही है।