श्री राजाराम जी महाराज का जीवन परिचय – Shri RajaRam Ji Maharaj ka jivan parichay

श्री राजाराम जी महाराज एक महान संत और आध्यात्मिक गुरु होने के साथ कलबी पटेल समाज के आराध्य देव भी है, जिनका जीवन समाज सेवा, भक्ति और धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित था। वे राजस्थान के जोधपुर क्षेत्र में एक लोकप्रिय संत के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने अपने चमत्कारों, उपदेशों और सादगी भरे जीवन से लाखों लोगों को प्रभावित किया। उनका जीवन परिचय ऐतिहासिक दस्तावेजों और लोक परंपराओं पर आधारित है, क्योंकि उनके जीवन के बारे में लिखित प्रमाण सीमित हैं। फिर भी, उनके भक्तों और शिष्यों द्वारा संरक्षित कथाएं और उनकी जीवनी “श्री राजाराम जीवन चरित्र” जैसी पुस्तकों के आधार पर उनका विस्तृत विवरण उपलब्ध है।

श्री राजाराम जी महाराज का जन्म और प्रारंभिक जीवन

श्री राजाराम जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1939 (लगभग 1882 ईस्वी) में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन हुआ था। उनका जन्म स्थान राजस्थान के जोधपुर जिले की लूणी तहसील के शिकारपुरा गांव हुआ। वे कलबी वंश की सिंह खांप गोत्र में एक गरीब किसान परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का नाम श्री हरिराम जी और माता का नाम श्रीमती मोती बाई था। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, और वे खेती-बाड़ी पर निर्भर थे।

बचपन से ही राजाराम जी में असाधारण गुण दिखाई देने लगे थे। कहा जाता है कि वे कम बोलते थे, लेकिन उनकी आंखों में एक गहरी शांति और तेज झलकता था। जब वे लगभग 10 वर्ष के थे, तब उनके पिता हरिराम जी का देहांत हो गया। कुछ समय बाद उनकी माता मोती बाई भी चल बसीं। इस दुखद घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। अनाथ होने के बाद, उनके बड़े भाई रघुनाथ राम जी संन्यासी बन गए और नंगे साधुओं की जमात में शामिल हो गए। इस तरह, छोटी उम्र में ही राजाराम जी अकेले रह गए। आप कुछ समय तक राजाराम जी अपने चाचा श्री थानारामजी व कुछ समय तक अपने मामा श्री मादारामजी भूरिया, गाँव धान्धिया के पास रहने लगे। बाद में शिकारपुरा के रबारियो की सांडिया, रोटी कपडे के बदले एक साल तक चारने का काम किया और गाँव की गायों को भी बिना लाठी लिए नंगे पाँव 2 साल तक राम-नाम रटते चराई।  

श्री राजाराम जी महाराज की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत

गाँव की गवाली छोड़ने के बाद श्री राजाराम जी ने गाँव के ठाकुर के घर 12 रोटियां प्रतिदिन व कपड़ो के बदले हाली का काम संभाल लिया।  इस समय राजाराम जी के होंठ केवल राम-नाम रटने में ही हिला करते थे।  श्री राजाराम जी अपने भोजन का आधा भाग नियमित रूप से कुत्तों को खिला देते थे जिसकी शिकायत ठाकुर से होने पर ठाकुर ने  बारह रोटियों के स्थान पर छ: रोटिया ही देने लगे, फिर 6 मे से तीन रोटिया राजाराम जी कुत्तों को डालने लगे, तो फिर से शिकायत करने पर ठाकुर ने  3 में से 1 रोटी ही प्रतिदिन राजाराम जी के लिए भेजना शुरू कर दिया, लेकिन फिर भी भगवन अपने खाने का आधा हिस्सा कुत्तों को खिलाते थे। 

इस प्रकार की ईश्वरीय भक्ति और दानशील स्वभाव से प्रभावित होकर देव-भारती नाम के एक महान पहुंचवान बाबाजी ने एक दिन श्री राजारामजी को अपना सच्चा सेवक समझकर अपने पास बुलाया और अपनी रिद्धि-सिद्धि श्री राजारामजी को देकर उन बाबाजी ने शिकरपुरा तालाब पर जीवित समाधी ले ली। 

एक दिन ठाकुर ने विचार किया की राजाराम जी को एक दिन में एक रोटी प्रतिदिन कम ही हैं और किसी भी व्यक्ति को जीवित रहने के लिए ये काफी नहीं हैं अतः ठाकुर ने भोजन की मात्रा फिर से निश्चित करने के उद्धेश्य से उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए बुलाया। एक दिन शाम को, जब वे भोजन के लिए ठाकुर के घर गए, तो उन्होंने बातों-बातों में 7.5 किलो आटे की रोटियां खा लीं, लेकिन उनकी भूख शांत नहीं हुई। यह देखकर ठाकुर और उनकी पत्नी आश्चर्यचकित रह गए। इस घटना के बाद, राजाराम जी ने ठाकुर को अपना काम सौंप दिया और शिकारपुरा गांव के तालाब के पास जोगमाया मंदिर में चले गए। यहीं से उनकी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हुई।

जोगमाया मंदिर में वे दिन-रात राम नाम का जाप करने लगे। उनकी भक्ति और तपस्या इतनी गहन थी कि लोग उनके प्रति आकर्षित होने लगे। कहा जाता है कि इस दौरान उन्होंने कई अलौकिक अनुभव प्राप्त किए। उनकी तपस्या और चमत्कारों की खबरें आसपास के गांवों में फैलने लगीं, और लोग उन्हें एक भगवान के रूप में देखने लगे।

श्री राजाराम जी महाराज की द्वारका यात्रा और चमत्कार

इधर सारे शिकरपुरा गाँव के लोगो को चमत्कार का समाचार मिलने पर लोग राजाराम जी दर्शनों के लिए आने लग गया। 

दुसरे दिन राजाराम जी ने द्वारिका का तीर्थ करने का विचार किया और दंडवत करते हुए द्वारिका रवाना हो गए | 5 दिनों में शिकारपुरा से पारलू पहुंचे और एक पीपल के पेड़ के नीचे हजारो नर-नारियो के बिच अपना आसन जमाया और उनके बिच से एकाएक इस प्रकार से गायब हुए की किसी को पता ही नहीं लगा। श्री राजाराम जी ने 10 महीने की द्वारका तीर्थ यात्रा की। द्वारका, जो भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मानी जाती है, उनके लिए एक पवित्र स्थल थी। इस यात्रा के दौरान उन्होंने कठिन तपस्या की और कई आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किए। यात्रा से लौटने के बाद, वे फिर से शिकारपुरा के जोगमाया मंदिर में प्रकट हुए। यहाँ उन्होंने लोगों के सामने अद्भुत चमत्कार दिखाए, जिससे उनकी ख्याति और बढ़ गई।

लोगों का उनके प्रति विश्वास इतना बढ़ गया कि वे उन्हें पूजने लगे। लेकिन भीड़ और लोगों के लगातार आगमन से परेशान होकर, राजाराम जी ने छह महीने का मौन व्रत रख लिया। इस दौरान वे किसी से बात नहीं करते थे और केवल भगवान के ध्यान में लीन रहते थे। शिवरात्रि के दिन, जब उन्होंने अपना मौन तोड़ा, तो लगभग 80,000 लोग उनके दर्शन और उपदेश सुनने के लिए एकत्र हुए। इस अवसर पर उन्होंने भक्ति, जीवन और चमत्कारों पर व्याख्यान दिया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन घटनाओं का विस्तृत वर्णन “श्री राजाराम जीवन चरित्र” नामक पुस्तक में मिलता है।

श्री राजाराम जी महाराज के परचा 

कन्या कंवारी हाथ सूं, रूपवाई उणवार।

    बोर पलट पीपल भई, अहो धन्य अवतार ।।

गुण गाऊ गोविन्द रा, रात दिवस महाराज। माडाणी पूजे मन, भीड़ लगे इण भाज।।

    इतसे कहत एक पल, उधड़ी छाप अनेक। पिछताया प्रताप, अरज करी उण वार में।।

सुण जो भूप जोधाण धणियां, मानो बात हमारी।

    खुशी होय थे जावो पोलो रमवा, जितो विलायत सारी।।

पाणी में पत्थर तिरे, इण सु मोटो काह। सिध हुयो न हावसी, वाह जोगेसर वाह ।

    त्रेता में रघुनाथ जब, सागर बांधी पाज। कलयुग में राजू करी, अमर बात नर आज।।

पाणी मंत्र मठकियो, पड़िये बकरे पास।

    अमृत छांट सू उठियो, मुवो कवरो खास।

तन राजीव सुतो कीउ भाई, जा उठ दौड़ जगल रे माहि।

    हरीयो हरीयो चरजे घास, खेलो जाय कुटुम्ब में साथ।।

कियो अचम्भो मानवी, हरने जाड़े हाथ।

    आज गुरू माने तारीया, मर जाता सब साथ।।


श्री राजारामजी महाराज ने संसारियों को अज्ञानता से ज्ञानता की ओर लाने के उद्देश्य से बच्चों को पढाने लिखाने पर जोर दिया। आपने जाति, धर्म, रंग आदि भेदों को दूर करने के लिए समय-समय पर अपने व्याख्यान दिये और बाल विवाह, कन्या विक्रय, मृत्युभोज जैसी समाज की बुराईयों का अंत करने का अथक प्रयत्न किया आपने लोगों को नशीली वस्तुओं के प्रयोग से कोसों दूर रहने का उपदेश दिया और शोषण विहीन होकर धर्मात्माओं की तरह समाज में रहने का पथ प्रदर्शन किया। आप एक अवतार थे, इस संसार में आये और समाज के कमजोर वर्ग की सेवा करते हुए श्रावण वद 14 संवत 2000 को इस संसार को त्याग करने के उद्देश्य से जीवित समाधि लेकर चले गये।

आपकी समाधि के बाद आपके प्रधान शिष्य श्रीदेवारामजी महाराज को आपके उपदेशों का प्रसार व प्रचार करने के उद्धेश्य से आपकी गद्धी पर बिठाया और महंत श्रीकी उपाधिसे विभूषित किया गया।

महंत श्री देवारामजी ने देश का भ्रमण करते हुए श्री राजारामजी महाराज के उपदेशों को संसारियों तक पहुंचाने का प्रयत्न करने में अपना जीवन लगा दिया है, जो आधुनिक साधुओं का आजकल के समाज के प्रति मूल कर्तव्य है। महंत श्री देवारामजी के प्रधान शिष्य श्री किशनारामजी आचार्य, शिष्य श्री भोलारामजी भी क्रमशः अपने विद्वतायुक्त व्याख्यानों और भावनायुक्त हरिभजूनों द्वारा श्री गुरूजी के अधूरे काम को पूरा करने में अपना जीबन लगाकर अथक प्रयत्न करते रहे हैं, जिसके लिए श्री राजारामजी महाराज संप्रदाय समाज आपका ऋणीरहेगा।

श्री देवारामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद श्री किशनारामजी महाराज को गादीपति से विभूषित किया गया। श्री किशनारामजी महाराज ने समाज को एक धागे में पिरोकर पूरे देश में दूर दूर फैले आंजणा समाज को एक मंच प्रदान कर गुरूजी की दी शिक्षाओं का प्रसार- प्रचार किया एवं समाज सेवा करते करते 6 जनवरी 2007 को देवलोकगमन कर गये।वर्तमान में गुरू गादी की चोथी पीढी के रूप में श्री दयारामजी महाराज को महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया।

श्री राजारामजी महाराज के भक्तों में ऑंजणा (कलबी) समुदाय के लोग विशेष रूप से शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस समुदाय के उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए। शिकारपुरा में उनका मंदिर आज भी तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, जहां हर साल हजारों लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं।

श्री राजारामजी महाराज के उपदेश और शिक्षाएं

श्री राजाराम जी महाराज के उपदेश सादगी और भक्ति पर आधारित थे। वे मानते थे कि भगवान का नाम जपना और सच्चाई के मार्ग पर चलना ही जीवन का असली उद्देश्य है। उनके अनुसार:
– **राम नाम की महिमा**: वे भगवान राम और श्रीकृष्ण की भक्ति पर विशेष जोर देते थे। उनका कहना था कि “राम नाम” हर दुख और संकट से मुक्ति दिलाता है।
– **सेवा और समर्पण**: उन्होंने लोगों को नि:स्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा दी। उनका जीवन स्वयं इस बात का उदाहरण था।
– **सादगी**: वे सादा जीवन जीते थे और लोगों को भी वैभव से दूर रहने की सलाह देते थे।

उनके उपदेशों में ठाकुर जी (श्रीकृष्ण) की भक्ति पर विशेष बल था। वे कहते थे कि ठाकुर जी की भक्ति से जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त होती है

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